ग्लोबल ब्रेकिंग न्यूज़छत्तीसगढ़रतनपुरसंपादक हरीश चौबेसबसे पहले सबसे आगे न्यूज

*मुस्लिम परिवार ने दान दी जमीन जहाँ विराजते हैं गणेश और दुर्गा *

रतनपुर ग्लोबल न्यूज नीरज जायसवाल की रिपोर्ट

*GLOBAL NEWS  विशेष साहित्यिक रिपोर्ट*
*10 अक्टूबर 2026 रतनपुर (बिलासपुर)*

*शकीर मोहम्मद के परिवार ने दिया इंसानियत का सबूत, मंदिर मस्जिद की राजनीति करने वालों के मुंह पर तमाचा है बाबूघाट*

*रतनपुर की मिट्टी में आज भी महकता है गंगा-जमुनी भाईचारा, नफरत फैलाने वालों को बाबूघाट का इतिहास देखना चाहिए*

रतनपुर को समझना है तो पहले उसकी मिट्टी को सूंघना होगा। यह मिट्टी केवल राख और धूल नहीं, यह तो शताब्दियों की आरती, अजान, ढोल और दुआओं से गूंथी हुई मिट्टी है। यह महामाया की नगरी है, पर इसका दिल इतना बड़ा है कि यहाँ हर धर्म, हर जाति के लिए जगह है।

कहते हैं बनारस में गंगा-जमुना मिलती हैं पर रतनपुर में दिल मिलते हैं

बाबूघाट चौक  ईंट-पत्थर नहीं, एहसास का नाम है
करैहापारा का बाबूघाट चौक। नाम तो चौक है, पर असल में यह रतनपुर की आत्मा का चौपाल है। यहीं एक बाड़ा है, सार्वजनिक बाड़ा। जहाँ पिछले बरस तक गणपति बप्पा अपने भक्तों को आशीर्वाद देते थे, और इस शारदीय नवरात्रि में माँ दुर्गा का सिंहासन सजेगा, ढोल-मंजीरे बजेंगे।

इस बाड़े की जमीन किसकी है?

यह जमीन न किसी ट्रस्ट की है, न किसी बड़े सेठ की। यह जमीन है रतनपुर के पूर्व पार्षद, जनाब शकीर मोहम्मद और उनके परिवार की एक मुस्लिम परिवार ने अपने हाथों से, अपने दिल से, अपनी जमीन मोहल्ले को दे दी – यह कहकर कि लो, यहाँ अपने भगवान को बैठाओ, अपना त्यौहार मनाओ, अपने बच्चों को हँसने दो

इससे बड़ा धर्मनिरपेक्षता का शिलालेख और क्या होगा? एक तरफ कुरान की तिलावत, दूसरी तरफ आरती की थाली – और बीच में इंसानियत का दिया जो बुझता ही नहीं।

नफरत के सौदागरों के नाम एक खुला खत

उन लोगों से पूछना चाहता हूँ जो दो-चार लाइक्स के लिए, कुछ वोटों के लिए धर्म की दीवार खड़ी करते हैं

कभी रतनपुर आओ। देखो, यहाँ मस्जिद के ठीक सामने हिंदू भाई की चाय की दुकान पर दोनों वक्त के नमाजी चाय पीते हैं। मंदिर के फूल-माला की दुकान मुस्लिम भाई बड़ी शिद्दत से चलाता है, क्योंकि उसे पता है फूल का कोई मजहब नहीं होता।

यहाँ महामाया की आरती की घंटी जब बजती है, तो पास की मस्जिद से उठती अजान उसका विरोध नहीं करती, बल्कि उसका स्वागत करती है। यही तो संगीत है यही तो रतनपुर है

शकीर मोहम्मद के परिवार ने जमीन दान नहीं की, उन्होंने एक संदेश दान किया है – कि धर्म देखकर नहीं, दिल देखकर रिश्ते बनते हैं।

बाबूघाट का वह बाड़ा कोई प्लॉट नहीं है, वह रतनपुर का जीवित स्मारक है। वह कहता है मुझे मंदिर-मस्जिद में मत बाँटो, मुझे मोहल्ला रहने दो

इसलिए ए नफरत फैलाने वालों, रतनपुर को रतनपुर ही रहने दो। यहाँ की मिट्टी में जहर नहीं बोया जा सकता, क्योंकि यहाँ सदियों से सिर्फ मोहब्बत उगती आई है।

कभी आइए, बाबूघाट में बैठिए, चाय पीजिए, और समझिए कि भारत क्या है
रतनपुर: जहाँ अजान और आरती एक साथ गूंजती है, बाबूघाट है भाईचारे का स्मारक

बाबू घाट मंच रतनपुर
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