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*अमरकंटक नर्मदा तट पर पितृपक्ष में उमड़ती है श्रद्धा*

*अमरकंटक से  श्रवण कुमार उपाध्याय की विशेष रिपोर्ट*

अमरकंटक नर्मदा तट पर पितृपक्ष में उमड़ती है श्रद्धा और कृतज्ञता की आस्था
आरंडी संगम पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व, पितरों की आत्मिक शांति के लिए पहुंचते हैं श्रद्धालु

अमरकंटक (अनूपपुर) मां नर्मदा की उद्गम स्थली पवित्र नगरी अमरकंटक में पितृपक्ष का पर्व श्रद्धा, कृतज्ञता और पूर्वजों के स्मरण का विशेष अवसर माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य जैसे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
सनातन परंपरा में पितृपक्ष को पितरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने तथा उनके आशीर्वाद की कामना का पावन काल माना गया है।

हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक की अवधि को पितृपक्ष अथवा श्राद्ध पक्ष कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए श्राद्ध, तर्पण एवं पिंडदान से पितरों को संतुष्टि प्राप्त होती है तथा वे अपने वंशजों को सुख, समृद्धि और कल्याण का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

*पितृपक्ष में तर्पण का विशेष महत्व*

जल, तिल और कुश के माध्यम से पितरों का स्मरण कर उन्हें तिलांजलि अर्पित की जाती है। नदियों और तीर्थस्थलों पर तर्पण करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

मां नर्मदा की उद्गम स्थली अमरकंटक स्थित *आरंडी संगम* पितृकर्म की दृष्टि से विशेष आस्था का केंद्र माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मोक्षदायिनी मां नर्मदा के पावन तट पर किए गए पितृकर्म का विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है।

*पिंडदान की परंपरा*

श्राद्ध कर्म में पिंडदान की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। चावल, जौ अथवा अन्य निर्धारित सामग्री से निर्मित पिंड पितरों को समर्पित किए जाते हैं, जो पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है। गया, काशी और प्रयागराज की भांति अमरकंटक के नर्मदा तट पर भी श्रद्धालु पितृकर्म कर अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं।

पंडित धनंजय तिवारी के अनुसार पितृपक्ष का वास्तविक संदेश केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है। माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों का सम्मान, जरूरतमंदों की सहायता तथा पूर्वजों द्वारा दिए गए संस्कारों का पालन भी पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

पितृपक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या पर होता है, जब ज्ञात और अज्ञात सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध एवं तर्पण करने की परंपरा निभाई जाती है।

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