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*12 वर्षों तक पति-पत्नी की तरह साथ रहने के बाद दर्ज हुई आपराधिक शिकायत*

कोटा ग्लोबल न्यूज गोपाल यादव की रिपोर्ट

*12 वर्षों तक पति-पत्नी की तरह साथ रहने के बाद दर्ज हुई आपराधिक शिकायत, कुटुंब न्यायालय के आदेश ने खड़े किए कई कानूनी सवाल*
छत्तीसगढ़ में एक प्रकरण ने लिव-इन रिलेशनशिप, आपराधिक आरोपों और भरण-पोषण के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। एक महिला द्वारा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 69, 296, 351(2) एवं 115(2) के तहत एक पुरुष के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया गया है, जो वर्तमान में जिला न्यायालय में विचाराधीन बताया जा रहा है। दूसरी ओर, इसी मामले में महिला द्वारा कुटुंब न्यायालय में अंतरिम भरण-पोषण के लिए याचिका भी प्रस्तुत की गई, जिस पर न्यायालय ने आवेदिका को प्रति माह चार हजार रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश जारी किया है।
कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित आदेश में यह उल्लेख किया गया है कि दोनों पक्ष लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते थे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, दोनों लगभग 12 वर्षों तक साथ रहे। ऐसे में यह मामला अब केवल दो व्यक्तियों के बीच का विवाद न रहकर, लिव-इन संबंधों की कानूनी स्थिति, आपराधिक मामलों की प्रकृति और भरण-पोषण के अधिकारों के संबंध में कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी मामले में कुटुंब न्यायालय प्रथम दृष्टया यह स्वीकार करता है कि दोनों पक्ष लंबे समय तक पति-पत्नी के समान साथ रहते थे, तो ऐसे मामलों में संबंधों की प्रकृति, सहमति, वैवाहिक स्थिति और अन्य तथ्यों का परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि, प्रत्येक न्यायिक मंच अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय करता है।
विधि विशेषज्ञों के अनुसार, भरण-पोषण से संबंधित आदेश और आपराधिक मामलों की सुनवाई अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाओं के अंतर्गत होती है। इसलिए कुटुंब न्यायालय द्वारा पारित अंतरिम आदेश को आपराधिक मामले में अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार, आपराधिक प्रकरण में लगाए गए आरोपों का अंतिम सत्यापन न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर ही होगा।
यह मामला इसलिए भी चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि इसमें एक ओर दीर्घकालीन सहजीवन संबंध का दावा है, वहीं दूसरी ओर गंभीर आपराधिक आरोपों की जांच और न्यायिक परीक्षण जारी है। कानूनी जानकारों का कहना है कि ऐसे मामलों में न्यायालयों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे व्यक्तिगत संबंधों की जटिल परिस्थितियों, उपलब्ध साक्ष्यों और प्रचलित कानूनों के बीच संतुलन स्थापित करें।
फिलहाल, संबंधित आपराधिक प्रकरण जिला न्यायालय में विचाराधीन है और कुटुंब न्यायालय द्वारा अंतरिम भरण-पोषण का आदेश पारित किया जा चुका है। ऐसे में इस मामले में अंतिम कानूनी स्थिति न्यायालयों के अंतिम निर्णय के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी। तब तक इस प्रकरण को लेकर उठ रहे प्रश्नों का उत्तर न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही सामने आएगा।

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