अमरकंटक ग्लोबल न्यूजमध्य प्रदेशसंपादक हरीश चौबेसबसे पहले सबसे आगे न्यूज

*अमरकंटक श्रावण मास की पूर्णिमा में संतों ने स्नान कर पूजा अर्चना की*

*अमरकंटक ग्लोबल न्यूज लाइव वेब श्रवण उपाध्याय की रिपोर्ट**अमरकंटक के नर्मदा उद्गम कुंड और रामघाट में श्रावणी पर्व को संत और ब्राह्मणों ने किया पूजन अर्चन और स्नान ।

अमरकंटक – मां नर्मदा जी की उद्गम स्थली/पवित्र नगरी अमरकंटक के उद्गम कुंड और रामघाट तट पर  श्रावण मास की पूर्णिमा पर श्रावणी पर्व का भव्य धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन किया गया । यह आयोजन श्रावण नक्षत्र की पूर्णिमा , संस्कृत दिवस , नारियल पूनम और रक्षाबंधन पर्व के साथ इस वर्ष शनिवार 9 अगस्त 2025 को संपन्न हुआ ।
नर्मदा मंदिर पुजारी पंडित धनेश द्विवेदी के आचार्यत्व में पहले पतित पावनी मां रेवा के पवित्र जल किनारे पूर्व दिशा की ओर मुख करके सभी विराजमान ब्राह्मण , पुरोहित आदि वैदिक परंपरानुसार जनेऊ परिवर्तन संस्कार किया गया जिसमें यह पूरे वर्ष भर मन , वचन और कर्म से हुई त्रुटियों की क्षमा याचना , आत्म शुद्धि , आध्यात्मिक उन्नति के उद्देश्य से की जाती है ।
पंडित आकाश द्विवेदी ने बताया कि आज नर्मदा उद्गम मंदिर प्रांगण में बने कुंड में नर्मदा मंदिर पुजारी परिवार पंडित उमेश द्विवेदी की उपस्थिति में आज संपूर्ण विद्वान और ब्राह्मण बंधुगण अपने अपने गोत्र के ऋषियों का तर्पण , देव पूजन आदि प्रक्रियाएं करवाकर तर्पण विधि की पद्धतियां कराई गई ।
इसी तरह मृत्युंजय आश्रम  के महामंडलेश्वर स्वामी हरिहरानंद जी महाराज, आचार्य, पुरोहित, ब्राह्मण एवं वेदपाठी बालक सभी पतित पावनी मां नर्मदा तट रामघाट पर पूजन आराधना बाद पवित्र जल में स्नान-डुबकी लगाकर जनेऊ परिवर्तन संस्कार वैदिक परंपरा के अनुसार मन, वचन और कर्म से हुई त्रुटियों की क्षमा-याचना, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए किया गया ।
श्रावणी पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है । इसे श्रावणी पूजन या उपनयन संस्कार दिवस भी कहते हैं । यह पर्व मुख्यतः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समाज में विशेष धार्मिक महत्व रखता है ।
वैदिक परंपरा में इसे वेदाध्ययन और यज्ञोपवीत परिवर्तन का दिन भी माना जाता है।
इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, गोत्र ऋषियों को तर्पण, देव पूजन, दान-पुण्य और हवन का विशेष महत्व है ।

धार्मिक मान्यता अनुसार श्रावणी पर्व पर किए गए स्नान, जनेऊ परिवर्तन, तर्पण और दान से पापों का क्षय होता है, पुण्य की प्राप्ति होती है तथा समाज में भाईचारे और आध्यात्मिक अनुशासन की भावना प्रबल होती है ।

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