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*अधिमास में अमरकंटक पहुंचीं संन्यासि स्वामी हर्षानंद गिरी*

अमरकंटक ग्लोबल न्यूज – श्रवण कुमार उपाध्याय की रिपोर्ट



मां नर्मदा की आराधना में बिताया एक सप्ताह , किए संत दर्शन


अमरकंटक – मां नर्मदा की पावन उद्गम स्थली पवित्र नगरी एवं तपोभूमि अमरकंटक में अधिमास के पुण्य अवसर पर संन्यासिनी स्वामी हर्षानंद गिरी (पूर्व नाम हर्षा रिछारिया) का आगमन श्रद्धालुओं और संत समाज के लिए विशेष धार्मिक महत्ता का केंद्र रहा । संन्यास दीक्षा प्राप्त करने के बाद उनका आगमन अमरकंटक में हुआ जिन्होंने लगभग एक सप्ताह तक अमरकंटक में प्रवास कर मां नर्मदा की आराधना , साधना , ध्यान एवं संत-संग में समय व्यतीत किया ।

सोशल मीडिया , एंकरिंग एवं मॉडलिंग के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुकी हर्षा रिछारिया ने उज्जैन स्थित निरंजनी अखाड़े में वैदिक रीति-विधानों के अनुसार संन्यास दीक्षा ग्रहण कर वैराग्य मार्ग को स्वीकार किया । संन्यास के उपरांत उन्हें “स्वामी हर्षानंद गिरी” नाम प्राप्त हुआ ।

अमरकंटक प्रवास के दौरान स्वामी हर्षानंद गिरी ने मां नर्मदा उद्गम मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना कर राष्ट्र , समाज एवं समस्त मानवता के कल्याण की कामना की । उन्होंने विभिन्न आश्रमों एवं मंदिरों में पहुंचकर संत-महात्माओं का आशीर्वाद प्राप्त किया ।
इस दौरान उन्होंने शांतिकुटी आश्रम पहुंचकर श्रीमहंत स्वामी रामभूषण दास जी महाराज से भेंट की तथा धर्म , संस्कृति एवं सनातन जीवन मूल्यों पर सार्थक चर्चा की । वहीं नर्मदा मंदिर के पुजारी पंडित रूपेश द्विवेदी से मुलाकात कर मां नर्मदा की महिमा एवं अमरकंटक के आध्यात्मिक महत्व की जानकारी प्राप्त की ।
नर्मदा मंदिर पुजारियों व संतो से चर्चा बाद स्वामी हर्षानंद गिरी ने कहा कि अमरकंटक का दिव्य , शांत एवं आध्यात्मिक वातावरण साधना और आत्मचिंतन के लिए अत्यंत अनुकूल है । मां नर्मदा के दर्शन एवं संतों के सान्निध्य से उन्हें अद्भुत आध्यात्मिक ऊर्जा तथा आत्मिक शांति का अनुभव हुआ । उन्होंने मां नर्मदा से विश्व में सुख , शांति , सद्भाव एवं धर्म की स्थापना की प्रार्थना की ।

प्राप्त जानकारी के अनुसार उज्जैन में संन्यास दीक्षा के दौरान शिप्रा तट पर पिंडदान , शिखा त्याग एवं दंड विसर्जन जैसे महत्वपूर्ण वैदिक संस्कार संपन्न हुए थे । यह संपूर्ण दीक्षा प्रक्रिया महामंडलेश्वर स्वामी सुमनानंद गिरी जी महाराज के सान्निध्य में सम्पन्न हुई ।
सनातन परंपरा में संन्यास को जीवन का सर्वोच्च आध्यात्मिक संस्कार माना गया है जिसमें साधक सांसारिक मोह-माया का त्याग कर ईश्वर भक्ति , साधना , सेवा एवं धर्म प्रचार के मार्ग पर अग्रसर होता है । स्वामी हर्षानंद गिरी का यह निर्णय अनेक युवाओं एवं श्रद्धालुओं के बीच आध्यात्मिक चेतना और सनातन मूल्यों के प्रति जागरूकता का संदेश देने वाला माना जा रहा है ।

अधिमास जैसे पुण्यकाल में मां नर्मदा की तपोभूमि अमरकंटक में उनका प्रवास श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्रोत बना रहा । संत समाज एवं धर्मप्रेमियों ने उनके उज्ज्वल आध्यात्मिक जीवन की मंगलकामना करते हुए इसे सनातन संस्कृति और आध्यात्मिक साधना के प्रति समर्पण का महत्वपूर्ण कदम बताया है ।

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